मैं दीप हूँ, मैं राह हूँ
सोनिया, टीजीटी, हिंदी
मैं दीप हूँ, मैं राह हूँ,
अँधेरों से न हारूँ मैं,
हवा जितनी भी तेज़ चले,
लौ अपनी बचा लूँ मैं।
मैं मिट्टी से उठी हूँ पर,
सपनों का गगन ओढ़ा,
ठोकरों ने ही सिखलाया,
कैसे चलना, कैसे मोड़ा।
जो टूटा था वही मुझमें,
नई ताक़त बना धीरे,
हर एक आँसू ने सिखलाया,
मुस्कुराना और भी गहरे।
मुझे रोका गया हर बार,
कहा—इतना न सोचना,
मैं चुप रही, मगर भीतर
संकल्प रहा—न झुकना।
मैं शब्दों से नहीं डरती,
न सन्नाटों से हारी हूँ,
मेरी ख़ामोशी में भी
हज़ारों घोषणाएँ जारी हैं।
अगर कल धूप कम होगी,
तो मैं सूरज उगा लूँगी,
जो राहें साथ न देंगी,
उन्हीं से राह बना लूँगी।
मैं थक कर भी जो चलती हूँ,
वही मेरी कहानी है,
मैं रुकती नहीं किसी मोड़ पर,
क्योंकि चलना ही ज़िंदगानी है।
मैं दीप हूँ, मैं राह हूँ,
मैं खुद ही उजियारा हूँ,
जो खुद को जीत लेता है—
वही सबसे बड़ा सहारा हूँ।