खूब लड़ी मर्दानी: झाँसी की रानी की शौर्य गाथा
श्रीमती साधना भागवत, ग्रंथपाल
"खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी"—यह पंक्तियाँ सुनते ही आँखों के सामने एक ऐसी वीरांगना की तस्वीर आ जाती है, जिसने अकेले ही ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी थी। रानी लक्ष्मीबाई का जन्म वाराणसी में हुआ था और उनका बचपन का नाम मणिकर्णिका (मनु) था। मनु को बचपन से ही तलवारबाजी, घुड़सवारी और मल्लखंब जैसे युद्ध कौशलों में महारत हासिल थी। उनका विवाह झाँसी के महाराज गंगाधर राव से हुआ, जिसके बाद वे 'लक्ष्मीबाई' कहलायीं। महाराज की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने कुटिल 'डॉकट्रिन ऑफ लैप्स' (हड़प नीति) के तहत उनके दत्तक पुत्र को उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया। अंग्रेज झाँसी को अपने कब्जे में लेना चाहते थे, लेकिन रानी ने गरजकर कहा, "मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी!" 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में रानी ने वीरता का अद्भुत परिचय दिया। जब अंग्रेजों ने झाँसी के किले को घेरा, तो रानी अपने छोटे पुत्र को पीठ पर बांधकर, घोड़े पर सवार होकर किले की ऊंची दीवार से कूद गईं। ग्वालियर के मैदान में रानी ने अंग्रेजों के साथ भीषण युद्ध किया। उन्होंने अपने दोनों हाथों में तलवारें लेकर दुश्मन के छक्के छुड़ा दिए। जनरल ह्यूरोज, जिसने उनके खिलाफ युद्ध का नेतृत्व किया था, ने खुद कहा था कि "विद्रोहियों में अगर कोई 'अकेला मर्द' था, तो वह यह महिला थी।" आज भी रानी लक्ष्मीबाई का नाम साहस और स्वाभिमान का प्रतीक है। प्रसिद्ध कविता की कुछ पंक्तियाँ:-सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी, गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी। चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।