Editorial

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Mar 19, 2026 - 09:00
Mar 19, 2026 - 13:45
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Editorial

संपादकीय

भूमंडलीकरण, निजीकरण एवं बाजारीकरण के इस युग में सृजन प्रक्रिया एक तरह से थम गई है क्योंकि अब हर बात का उत्तर ए. आय. से पूछा जाता है। ए. आय. यह बना कर दे दो, ए. आय. इसका उत्तर बताओं। इतना ही नहीं कविता आदि तक के लिए ए. आय. से पूछा जा रहा हैं। यह एक तरह से सृजनात्मकता का पर्याय नहीं बल्कि उसका -हास है ऐसा मैं समझता हूँ। क्या आनेवाले समय में ए. आय. की निर्भरता हमें पंगु बना देगी? यह बात हम जैसे कर्म साद्य लोगों की चिंता को बढा देती है। क्योंकि हमने उस युग को अनुभव किया हैं जिसमें कहा जाता था कि, “पसीने की स्याही से लिखते है अपने इरादों को, उनके मुकद्दर के पन्ने कभी कोरे नहीं हुआ करते।”  क्या ए. आय. वाला पर्याय इस पंक्ति को दुर्लभ कर देगा। क्या हमारी आनेवाली पीढ़ी आत्मनर्भर बनेगी या परनिर्भर? ऐसे कई सवाल हमें कोसते रहते हैं। शायद इसी के उत्तर की खोज छात्रों के द्वारा लिखित यह सृजनात्मक लेखन हो और यह साहित्य विशेषांक। 

साहित्य प्रबल  भावों, विचारों  की अभिव्यक्ति है। मनुष्य जो अनुभव करता है, उसकी अभिव्यक्ति किसी न किसी रूप में होती ही है उसी को अरस्तू ने विरेचन सिद्धांत (Catharsis Theory) माना है। आज मेरे नवोदय विद्यालय द्वारा जो साहित्य विशेषांक लेखन का प्रयास किया गया है वह सही मायने मैं काबिले तारीफ है। 6 कक्षा से लेकर 12 वीं कक्षा तक के छात्रों ने इसमें कुछ न कुछ लिखा है। यह उनकी शुरूआत है ऐसा मैं मानता हॅूं किन्तु यह शुरूआत भविष्य में इन्हीं में से एक बड़े साहित्यकार को जन्म दे सकता है इसका मुझे पूरा विश्वास है। यह विशेषांक त्रि-भाषिक सूत्र को लेकर चलता है। मराठी, हिंदी और अंग्रेजी भाषा में छात्रों ने उसमें अपने आप को अभिव्यक्त किया है। यह विशेषांक साहित्य की दृष्टि से क्या महत्त्व रखता है। इसके तह तक  मैं नहीं जाना चाहूंगा क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि शुरूआती कदम लड़खड़ाते हैं परंतु वह सही दिशा में अग्रक्रम कर रहे हैं इसकी मुझे खुशी है। इसमें कविता, कहानी, आत्मकथा, जीवनी या निबंध के निशान मिलेगें परंतु उसमें साहित्य के तत्त्वों की पूर्ति होगी है यह कहना मुश्किल है ऐसा मैं मानता हॅूं किन्तु पढ़नेवाले वाचक छात्र के विचार, मनोदशा से निश्चित ही परिचित होगें इसका मुझे पूरा विश्वास है।  नवोदय विद्यालय के इस साहित्य क्षेत्र में एक कदम का मैं स्वागत! करता हॅूं और अन्त में कवि अरूण कमल के इन पंक्तियों से अपने वाणी को  विराम देता हॅूं- ‘‘सारा लोहा उन लोगों का. अपनी केवल धार ।’’

                                                                                                                                                     

                                                                                                                श्रीमती साधना भागवत,

                                                                                                                   पुस्तकालयाध्यक्षा,

                                                                                                             जवाहर नवोदय विद्यालय, बीड